लालची पड़ोसी और गरीब पड़ोसी ।। Hindi kahani । Moral story । Cartoon kahaniya।।

          पड़ोसी का धर्म

कहानी के पात्र:

माधव: एक सीधा-साधा और ईमानदार किसान, जो अपनी मेहनत पर विश्वास रखता है।
गजेन्द्र: माधव का पड़ोसी, जो अमीर है लेकिन मन में लालच और जलन रखता है।
सुमित्रा: माधव की पत्नी, समझदार और अपने परिवार को संभालने वाली।
बिरजू: गजेन्द्र का बेटा, जो शहर से पढ़कर आया है, थोड़ा घमंडी।
काका (हरिया): गाँव का सबसे पुराना और अनुभवी व्यक्ति।
तांत्रिक (भोंदू): एक ढोंगी बाबा जो गजेन्द्र के इशारे पर काम करता है।
गाँव के लोग: तमाशबीन और अफवाहों पर भरोसा करने वाले।
कहानी की शुरुआत





नरेशन : अमावस की काली रात थी। हवाएं ऐसे चल रही थीं मानो कोई रो रहा हो। पूरे गाँव में सन्नाटा था, लेकिन गाँव के किनारे बने माधव और गजेन्द्र के घरों के बीच वाली पुरानी दीवार के पास कुछ अजीब हलचल हो रही थी। गजेन्द्र, हाथ में लालटेन और कुदाल लिए, उस दीवार के पास कुछ ढूंढ रहा था। उसके चेहरे पर पसीना था और आँखों में एक अजीब सा लालच।


गजेन्द्र : (फुसफुसाते हुए) बस... बस आज की रात। अगर उस पुराने नक्शे की बात सच निकली, तो इस माधव की जमीन के नीचे दबा वो पुरखों का सोना मेरा होगा। बस मुझे किसी तरह इस दीवार को गिराना होगा और इल्जाम माधव पर लगाना होगा।
नरेशन : गजेन्द्र अभी खुदाई कर ही रहा था कि अचानक जमीन के नीचे से एक भारी और डरावनी आवाज आई... "धड़ाम!"... जैसे कुछ बहुत भारी चीज गिरी हो। गजेन्द्र डर के मारे पीछे हट गया।
गजेन्द्र : अरे बाप रे! ये कैसी आवाज थी? कहीं कोई देख तो नहीं लिया? नहीं-नहीं, सब सो रहे हैं। लेकिन ये आवाज... ये तो जमीन के बहुत अंदर से आई है। जरूर सोना यहीं है।
नरेशन : अगली सुबह... सूरज निकलते ही गाँव में शोर मच गया। माधव और गजेन्द्र के बीच की वो पुरानी दीवार गिर चुकी थी। माधव अपनी टूटी हुई दीवार को देख सिर पकड़ कर बैठा था।
Scene 1: माधव के घर का आंगन
माधव : अरे गजेन्द्र भाई, ये क्या अनर्थ हो गया? कल रात तक तो ये दीवार बिल्कुल ठीक थी। अचानक ये कैसे गिर गई? और देखो, मेरी तरफ का कितना हिस्सा दब गया है।
गजेन्द्र : (झूठा गुस्सा दिखाते हुए) अरे ओ माधव! तुम मुझसे पूछ रहे हो? जरूर तुमने ही रात को अपनी जमीन बढ़ाने के चक्कर में इसकी नींव खोदी होगी। अब देखो, मेरा भी कितना नुकसान हो गया। मेरी गाय बंधी थी वहां, वो तो बाल-बाल बच गई।
माधव : अरे भाई, आप ये क्या कह रहे हैं? मैं ऐसा क्यों करूंगा? हम तो वैसे ही दो वक्त की रोटी मुश्किल से जुटा पाते हैं, मैं दीवार गिराकर अपना ही घर क्यों तोडूंगा? भगवान गवाह है, मैंने कुछ नहीं किया।
सुमित्रा : (रोते हुए) हाँ गजेन्द्र भैया, हम गरीब जरूर हैं लेकिन बेईमान नहीं। कल रात बहुत तेज हवा चल रही थी, हो सकता है पुरानी होने की वजह से दीवार गिर गई हो। आप हम पर इल्जाम मत लगाइए।
गजेन्द्र : बस-बस! अब ये रोना-धोना बंद करो सुमित्रा। मुझे सब पता है। गाँव में बात फैल गई है कि तुम्हारी जमीन के नीचे कुछ है, इसलिए तुम खुदाई कर रहे थे।
माधव : जमीन के नीचे? क्या है जमीन के नीचे? भाई, मुझे तो कुछ नहीं पता। आप कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं?
गजेन्द्र : देखो माधव, अब बात बढ़ गई है। ये दीवार अब दोबारा तभी बनेगी जब तुम इस जमीन का ये हिस्सा मेरे नाम कर दोगे। वैसे भी तुम्हारी ये जमीन बंजर होती जा रही है।
नरेशन : माधव हैरान था। एक टूटी दीवार के बदले गजेन्द्र उसकी पुश्तैनी जमीन मांग रहा था। माधव को गजेन्द्र की आँखों में वो लालच दिखाई दे रहा था जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।
Scene 2: गाँव का बरगद का पेड़
नरेशन : दोपहर के वक्त माधव उदास होकर गाँव के बड़े बरगद के पेड़ के नीचे बैठा था। तभी वहां गाँव के बुजुर्ग हरिया काका आते हैं।
हरिया काका : क्या हुआ माधव? चेहरा इतना लटका हुआ क्यों है? मैंने सुना तुम्हारी और गजेन्द्र की दीवार गिर गई?
माधव : हाँ काका। लेकिन बात सिर्फ दीवार की नहीं है। गजेन्द्र भाई अजीब बर्ताव कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि मैंने जानबूझकर दीवार गिराई क्योंकि मेरी जमीन के नीचे कुछ है। काका, आप तो हमारे बाप-दादाओं के समय से यहाँ हैं, क्या मेरी जमीन में कोई राज है?
हरिया काका : (गहरी सोच में डूबते हुए) हूँ... राज। देखो बेटा, पुरानी कहानियाँ तो बहुत हैं। कहते हैं कि सालों पहले, जब अकाल पड़ा था, तो एक साधु ने उस जमीन पर एक श्राप और एक वरदान, दोनों दिए थे। लेकिन वो सब कहने-सुनने की बातें हैं। गजेन्द्र जरूर किसी और फिराक में है।
माधव : कैसी फिराक काका? हम पड़ोसी हैं, सुख-दुख के साथी हैं। वो ऐसा क्यों करेगा?
हरिया काका : बेटा, जब इंसान की आँखों पर लालच का पर्दा पड़ता है, तो उसे पड़ोसी का धर्म नहीं, सिर्फ अपना फायदा दिखता है। तुम सावधान रहना। मुझे कल रात गजेन्द्र के घर की तरफ से कुछ अजीब आवाजें सुनाई दी थीं। जैसे कोई मंत्र पढ़ रहा हो।
माधव : मंत्र? लेकिन गजेन्द्र भाई तो पूजा-पाठ में इतना मानते नहीं। ये सब क्या हो रहा है काका? मुझे डर लग रहा है।
Scene 3: गजेन्द्र का घर (रात का समय)
नरेशन : रात हो चुकी थी। गजेन्द्र अपने घर के अंदर एक तांत्रिक के साथ बैठा था। वही तांत्रिक जिसने गजेन्द्र को उस नकली नक्शे और खजाने के बारे में बताया था।
तांत्रिक : (हंसते हुए) देखा गजेन्द्र? मेरा काम देखा? दीवार भी गिर गई और माधव डर भी गया। अब बस एक चाल और, फिर वो खुद अपनी जमीन तुम्हें सौंप कर गाँव छोड़कर भाग जाएगा।
गजेन्द्र : लेकिन बाबा, वो आवाज... कल रात जब मैं खोद रहा था, तो जमीन के नीचे से बहुत डरावनी आवाज आई थी। कहीं सच में वहाँ कोई मुसीबत तो नहीं?
तांत्रिक : अरे मूर्ख! वो तो बस हवा का दबाव था जो सालों से बंद जमीन के खुलने पर निकला। वहाँ सिर्फ सोना है, सोना! और उस सोने तक पहुँचने के लिए हमें माधव को डराना होगा। कल रात हम ऐसा तमाशा करेंगे कि माधव की रूह कांप जाएगी।
गजेन्द्र : ठीक है बाबा। मुझे वो सोना चाहिए। बिरजू शहर से आ गया है, उसे बहुत पैसे चाहिए अपना व्यापार शुरू करने के लिए। मैं अपने बेटे के लिए कुछ भी कर सकता हूँ। पड़ोसी का धर्म जाए भाड़ में।
Scene 4: माधव के घर का आंगन (अगली रात)
नरेशन : माधव और सुमित्रा सो रहे थे। अचानक उनके आंगन में अजीब-अजीब आवाजें आने लगीं। "हहूऊऊ... हहूऊऊ..." जैसे कोई जानवर भी नहीं, और इंसान भी नहीं। साथ ही, आंगन में पड़े बर्तन अपने आप गिरने लगे।
सुमित्रा : (नींद से जागते हुए) अरे सुनिए! सुनिए! उठिए न! बाहर देखिए कैसी आवाजें आ रही हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है।
माधव : (हड़बड़ा कर उठते हुए) क्या हुआ? कौन है? रुको, मैं लालटेन जलाता हूँ।
नरेशन : माधव ने जैसे ही लालटेन जलाई और दरवाजा खोला, उसने देखा कि उसकी टूटी हुई दीवार के पास एक सफेद साया खड़ा है। वो साया हवा में झूल रहा था।
माधव : (कांपते हुए) कौ... कौन है वहां? कौन है भाई?
आवाज : (भारी और गूंजती हुई) ये जमीन छोड़ दो माधव... ये जमीन मेरी है... अगर जान प्यारी है तो भाग जाओ यहाँ से...
नरेशन : माधव और सुमित्रा डर के मारे एक-दूसरे से चिपक गए। वो साया अचानक गायब हो गया। माधव पसीने से लथपथ हो गया।
सुमित्रा : मैंने कहा था न आपसे! ये जमीन शापित है। गजेन्द्र भैया सही कह रहे थे। हमें उनकी बात मान लेनी चाहिए। हमें ये जमीन उन्हें दे देनी चाहिए और यहाँ से चले जाना चाहिए। जान है तो जहान है।
माधव : नहीं सुमित्रा। मेरे पिताजी कहते थे कि अपनी मिट्टी माँ होती है। माँ को डर के मारे छोड़ कर नहीं भागते। और मुझे इसमें कुछ गड़बड़ लग रही है। भूतों को जमीन-जायदाद से क्या लेना-देना? वो तो मुक्ति चाहते हैं, जमीन नहीं।
Scene 5: गाँव की पगडंडी (सुबह)
नरेशन : माधव सुबह-सुबह हरिया काका को ढूंढने निकला। रास्ते में उसे गजेन्द्र का बेटा बिरजू मिला। बिरजू ने कानों में हेडफोन लगा रखे थे और हाथ में कुछ मशीन थी।
बिरजू : अरे माधव काका! राम-राम। सुना रात को आपके घर हंगामा हुआ? पिताजी बता रहे थे कि आप बहुत डरे हुए हैं।
माधव : राम-राम बेटा। हाँ, कुछ तो हुआ था। पर तुम यहाँ इस मशीन के साथ क्या कर रहे हो?
बिरजू : (थोड़ा घबराते हुए) अ... कुछ नहीं काका। ये तो बस... मिट्टी जांचने की मशीन है। मैं देख रहा था कि यहाँ खेती के लिए मिट्टी कैसी है। वैसे काका, पिताजी कह रहे थे कि आप जमीन बेचने की सोच रहे हैं? अगर बेचें, तो हमें ही दीजियेगा। बाहर वालों से अच्छा है, पड़ोसी के पास रहे।
माधव : (मन में सोचते हुए) बाप जमीन मांग रहा है, बेटा मिट्टी जाँच रहा है। और रात को भूत आया था। ये सब कड़ियां आपस में जुड़ी हुई हैं।
माधव : नहीं बेटा, अभी तो मैं नहीं बेच रहा। लेकिन तुम अपनी ये मशीन लेकर उस टूटी दीवार के पास क्यों नहीं जाते? शायद वहां की मिट्टी में कुछ खास हो।
बिरजू : (हंसते हुए) अरे काका, आप भी मजाक करते हैं। ठीक है, मैं चलता हूँ।
नरेशन : माधव ने देखा कि बिरजू के जाने के बाद, उसकी जेब से एक छोटा सा तार का टुकड़ा गिर गया। माधव ने उसे उठाया। वो एक छोटे स्पीकर का तार था। माधव की आँखों में एक चमक आ गई।
Scene 6: माधव का घर (दोपहर)
माधव : सुमित्रा! सुमित्रा! इधर आओ। देखो मुझे क्या मिला।
सुमित्रा : ये क्या है? ये तो कोई बिजली का तार लगता है।
माधव : हाँ, और ये मुझे बिरजू की जेब से गिरते हुए मिला। और तुम्हें पता है, कल रात वो आवाज कैसी थी? बिल्कुल वैसी ही जैसे गाँव के मेले में वो नाटक वाले निकालते हैं। मुझे अब पक्का यकीन हो गया है सुमित्रा, ये कोई भूत-प्रेत नहीं है। ये गजेन्द्र और उसके बेटे की चाल है।
सुमित्रा : हे भगवान! अपने ही पड़ोसी के साथ ऐसा धोखा? लेकिन वो ऐसा क्यों करेंगे? उनके पास तो सब कुछ है।
माधव : लालच, सुमित्रा। लालच इंसान को अंधा कर देता है। हरिया काका ने कहा था कि मेरी जमीन के नीचे कुछ राज है। शायद गजेन्द्र को लगता है कि यहाँ खजाना गड़ा है।
सुमित्रा : तो अब हम क्या करेंगे? अगर हम उनसे लड़ने गए तो वो अमीर हैं, गाँव वाले उन्हीं की मानेंगे।
माधव : हम लड़ेंगे नहीं। हम 'पड़ोसी का धर्म' निभाएंगे। अगर उन्हें खजाना चाहिए, तो हम उन्हें खजाना देंगे। लेकिन वो खजाना नहीं होगा, जो वो सोच रहे हैं।
Scene 7: रात का समय (दीवार के पास)
नरेशन : माधव ने एक योजना बनाई। उसने जोर-जोर से सुमित्रा से बातें करनी शुरू कीं, ताकि बगल में कान लगाए बैठा गजेन्द्र सुन सके।
माधव : (ऊंची आवाज में) सुमित्रा, तुम्हें पता है? आज मुझे सपना आया। मेरे दादाजी ने बताया कि उस टूटी दीवार के ठीक नीचे, दस हाथ गहराई पर एक घड़ा है। लेकिन उसे सिर्फ आज रात को ही निकाला जा सकता है, वरना वो हमेशा के लिए पत्थर बन जाएगा।
सुमित्रा : (इशारा समझते हुए) सच? तो हम अभी खोदते हैं न।
माधव : नहीं-नहीं, मेरी कमर में बहुत दर्द है। हम कल सुबह देखेंगे। अगर किस्मत में होगा तो मिलेगा। चलो सो जाते हैं।
नरेशन : दीवार की दूसरी तरफ गजेन्द्र और बिरजू ने ये सब सुना। उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
गजेन्द्र : (फुसफुसाते हुए) सुना तुमने बिरजू? दस हाथ नीचे! और आज की ही रात। माधव तो सो गया। चलो, हम अभी खोदते हैं। सुबह होने से पहले खजाना हमारा होगा।
बिरजू : लेकिन पिताजी, ये चोरी होगी।
गजेन्द्र : चुप कर! ये अकलमंदी है। पड़ोसी सो रहा है, तो उसका फायदा उठाना ही दुनिया का नियम है। चल कुदाल उठा।


Scene 8: खुदाई वाली जगह
नरेशन : गजेन्द्र और बिरजू ने चुपचाप माधव की जमीन की तरफ खुदाई शुरू कर दी। वो पागलों की तरह मिट्टी हटा रहे थे। एक हाथ... दो हाथ... पांच हाथ...
बिरजू : पिताजी, मुझे डर लग रहा है। यहाँ मिट्टी बहुत गीली है। और अजीब सी गंध आ रही है।
गजेन्द्र : डर मत। वो सोने की पुरानी गंध होगी। बस थोड़ा और... हमें अमीर बनने से कोई नहीं रोक सकता।
नरेशन : जैसे ही उन्होंने दस हाथ की गहराई पार की, कुदाल एक सख्त चीज से टकराई। "टन!!"
गजेन्द्र : मिल गया! मिल गया बिरजू! खजाना मिल गया!
नरेशन : लेकिन जैसे ही गजेन्द्र ने जोर से कुदाल मारी उस सख्त चीज को तोड़ने के लिए, वहां से कोई सोना नहीं निकला। बल्कि एक बहुत तेज धार पानी की फूटी। "शूऊऊऊ!!" वो पानी नहीं था, वो गाँव का पुराना सीवेज (गंदा नाला) का बंद रास्ता था जो सालों पहले बंद कर दिया गया था और उसमें जहरीली गैस बन गई थी।
गजेन्द्र : (खांसते हुए) अरे! ये क्या है? ये तो बदबूदार पानी है! मेरी आँखों में जलन हो रही है! बिरजू भाग!
नरेशन : लेकिन पानी का दबाव इतना तेज था कि गड्ढे की मिट्टी धसने लगी। बिरजू का पैर फिसल गया और वो उस गहरे गड्ढे में गिर गया। ऊपर से मिट्टी गिरने लगी।
बिरजू : (चिल्लाते हुए) पिताजी! बचाओ! मैं धंस रहा हूँ! पिताजी!
गजेन्द्र : बिरजू! बेटा! मेरा हाथ पकड़!
नरेशन : गजेन्द्र कोशिश कर रहा था, लेकिन जहरीली गैस के कारण उसका दम घुट रहा था। वो भी बेहोश होने लगा। वो खुद भी गड्ढे में गिरने ही वाला था।


Scene 9: बचाव कार्य
नरेशन : तभी अचानक वहां माधव दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में एक रस्सा था और मुंह पर कपड़ा बंधा हुआ था। उसके पीछे हरिया काका और कुछ गाँव वाले भी थे।
माधव : गजेन्द्र भाई! हटो वहां से!
नरेशन : माधव ने अपनी जान की परवाह किए बिना, रस्सा गजेन्द्र की कमर में नहीं, बल्कि गड्ढे में फंसे बिरजू की तरफ फेंका।
माधव : बिरजू बेटा! रस्सी पकड़ो! जल्दी!
बिरजू : (रोते हुए) काका... मैं मर जाऊंगा... मुझे बचा लीजिये!
माधव : (पूरी ताकत लगाते हुए) नहीं मरने दूंगा! तू मेरे बेटे जैसा है। जोर लगाओ!
नरेशन : माधव ने अपनी एड़ियाँ जमीन में गड़ा दीं। उसके हाथ छिल गए, खून निकलने लगा, लेकिन उसने रस्सी नहीं छोड़ी। सुमित्रा और हरिया काका ने भी पीछे से रस्सी पकड़ ली। "हैया... जोर लगा के... हैया!"
नरेशन : धीरे-धीरे, कीचड़ और गंदगी से सने बिरजू को बाहर खींच लिया गया। उसके बाद उन्होंने गजेन्द्र को भी सुरक्षित स्थान पर खींचा जो गैस की वजह से निढाल हो गया था।


Scene 10: माधव के घर का बरामदा (सुबह)
नरेशन : सुबह हो चुकी थी। गजेन्द्र और बिरजू अब होश में थे। पूरा गाँव इकट्ठा था। गजेन्द्र सिर झुकाए बैठा था। उसे किसी से नजर मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी।
हरिया काका : देख लिया गजेन्द्र? जिसे तुम खजाना समझ रहे थे, वो मौत का कुआं था। और जिसे तुम बर्बाद करना चाहते थे, उसी ने आज तुम्हारे कुल के दीपक को बुझने से बचाया है।
गजेन्द्र : (रोते हुए माधव के पैरों में गिरकर) मुझे माफ़ कर दे माधव। मैं अंधा हो गया था। लालच ने मेरी बुद्धि भ्रष्ट कर दी थी। मैंने तेरे घर पर भूत का नाटक करवाया, तेरी दीवार तोड़ी, तेरी जमीन हड़पना चाहा... और तूने? तूने मेरे बेटे की जान बचाई।
माधव : (गजेन्द्र को उठाते हुए) उठो भाई। पड़ोसी का धर्म सिर्फ साथ रहना नहीं होता, मुसीबत में एक-दूसरे की ढाल बनना होता है। जमीन-जायदाद तो यहीं रह जाएगी, लेकिन अगर आज बिरजू को कुछ हो जाता, तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता।
बिरजू : काका, मैं शहर से पढ़कर आया, लेकिन असली पढ़ाई तो आज आपने सिखाई। मुझे माफ़ कर दीजिये।
माधव : अरे बेटा, बीती ताही बिसार दे। बस याद रखना, दूसरों का हक मार कर कभी बरकत नहीं होती।


Scene 11: गाँव का दृश्य (कुछ दिनों बाद)
नरेशन : उस घटना के बाद, गजेन्द्र पूरी तरह बदल गया। उसने अपने खर्च पर माधव की दीवार दोबारा बनवाई, और सिर्फ दीवार ही नहीं, बल्कि माधव के पूरे घर की मरम्मत करवाई। वो जहरीला नाला जो खुला था, उसे गाँव वालों ने मिलकर सही दिशा दी, जिससे अब खेतों की सिंचाई होने लगी।
गजेन्द्र : माधव भाई, अब हम दीवार नहीं रखेंगे। बीच में एक छोटा दरवाजा रखेंगे। ताकि जब भी जरूरत हो, हम एक आवाज में एक-दूसरे के पास पहुँच सकें।
माधव : (मुस्कुराते हुए) ये हुई न बात गजेन्द्र भाई।
नरेशन : अब उस गाँव में माधव और गजेन्द्र की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। जो जमीन कल तक झगड़े की जड़ थी, अब वहां दोनों मिलकर खेती करते थे। फसल लहलहा रही थी, बिल्कुल उनकी दोस्ती की तरह।


Scene 12: तांत्रिक का पर्दाफाश
नरेशन : लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी। वो ढोंगी तांत्रिक अभी भी गाँव में घूम रहा था और दूसरे लोगों को ठगने की कोशिश कर रहा था। बिरजू ने ठान लिया था कि वो उसे सबक सिखाएगा।
बिरजू : काका, उस तांत्रिक ने ही पिताजी को भड़काया था। उसे ऐसे जाने नहीं दे सकते।
माधव : चिंता मत करो बेटा। उसका इलाज भी मेरे पास है।
नरेशन : माधव और बिरजू ने मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने गाँव के बीचों-बीच एक "जादुई यज्ञ" का नाटक रचा। तांत्रिक को लगा कि यहाँ भी कुछ माल मिलेगा, वो वहां आ गया।
तांत्रिक : (मंत्र पढ़ते हुए) ओम... भट... स्वाहा! यहाँ बहुत बड़ा खजाना है, लेकिन उसके लिए सबको अपनी-अपनी सोने की अंगूठियां इस आग में डालनी होंगी। तभी माता प्रसन्न होंगी।
नरेशन : गाँव वाले, जो अब माधव और गजेन्द्र की सच्चाई जान चुके थे, वो गुस्से से तांत्रिक को देख रहे थे।
बिरजू : (मशीन लेकर आगे आते हुए) बाबा, मेरी ये मशीन कह रही है कि खजाना जमीन के नीचे नहीं, तुम्हारी झोली के अंदर है।
नरेशन : बिरजू ने सबके सामने तांत्रिक की झोली उल्टी कर दी। उसमें से गजेन्द्र के घर से चुराई गई कुछ चीजें और चुंबक निकला, जिससे वो चीजों को हिलाता था। गाँव वालों ने तांत्रिक को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया।


Scene 13: गजेन्द्र का बगीचा
नरेशन : एक शांत शाम, गजेन्द्र और माधव बगीचे में बैठे चाय पी रहे थे।
गजेन्द्र : माधव, एक बात पूछूं? तुम्हें कैसे पता चला कि मैं उस रात खुदाई करने वाला हूँ? और वो 'सपना' वाली बात... वो झूठ थी न?
माधव : (हंसते हुए) अरे भाई, जब नीयत साफ हो, तो भगवान भी साथ देता है। मुझे पता था कि तुम मेरी बातें सुन रहे हो। और वो गंदा नाला... वो तो मेरे दादाजी ने मुझे बचपन में बताया था कि वहां कभी मत खोदना। मैंने तो बस तुम्हें सबक सिखाने के लिए वो नाटक किया था। मुझे नहीं पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी।
गजेन्द्र : जो हुआ अच्छे के लिए हुआ। उस गंदगी के निकलने से मेरा मन भी साफ हो गया।
सुमित्रा : (चाय लाते हुए) चलिए, अब पुरानी बातें छोड़िये। देखो, हमारे खेत कितने हरे-भरे लग रहे हैं।


Scene 14: कहानी का अंत
नरेशन : सुखपुर गाँव में अब कोई भी पड़ोसी एक-दूसरे से जलता नहीं था। माधव और गजेन्द्र की कहानी ने सबको सिखा दिया था कि असली खजाना जमीन के नीचे नहीं, बल्कि अच्छे रिश्तों और आपसी विश्वास में होता है।
गजेन्द्र : (दर्शकों की ओर देखते हुए, काल्पनिक रूप से) दोस्तों, दीवारें तो ईंट-पत्थर की होती हैं, टूट भी जाएं तो बन जाती हैं। लेकिन विश्वास की दीवार कभी मत टूटने देना। और हाँ, अपने पड़ोसी का ख्याल रखना, क्योंकि मुसीबत में सबसे पहले वही काम आता है, रिश्तेदार तो बाद में आते हैं।
माधव : सही कहा भाई। और लालच... वो तो दीमक है। मेहनत की रोटी में जो स्वाद है, वो छीन कर खाने में कहाँ?
नरेशन : सूरज ढल रहा था, और उसकी सुनहरी रोशनी में माधव और गजेन्द्र हंसते हुए अपने घरों की ओर बढ़ रहे थे। एक नई सुबह उनका इंतजार कर रही थी।
THE END

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