भूख से भी बड़ा था उसका ईमान. Part 2 !! Hindi kahani

भूख से भी बड़ा था उसका ईमान Part 2

Scene 11 राजदरबार के भीतर का रहस्य 

नरेशन : दरबार में सन्नाटा ऐसा था कि अगर कोई सुई भी गिरती तो उसकी आवाज़ गूंज जाती। सबकी नज़रें उस खुले हुए संदूक पर टिकी थीं। माधव ने अपनी सांसें रोक रखी थीं और जगन की आंखों में लालच अब भी तैर रहा था, भले ही उसे सजा का डर था। राजा रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर संदूक के पास आए। उन्होंने झुककर अंदर देखा और फिर एक पल के लिए चौंक गए।

राजा रणजीत सिंह : अरे यह क्या, यह तो असंभव है। हमने सोचा था इसमें हीरे-जवाहरात होंगे, लेकिन इसमें तो कुछ और ही है।

जगन : क्या है महाराज, क्या है। मुझे पता था इसमें जरूर बेशकीमती खजाना होगा। अगर सोना नहीं है तो पक्का हीरे होंगे, या फिर किसी पुराने राज्य के नक्शे। महाराज, जो भी है उसका आधा हिस्सा तो मेरा बनता है न, आखिर मैं माधव का बड़ा भाई हूं।

राजा रणजीत सिंह : (गुस्से से जगन की ओर देखते हुए) शांत रहो जगन। तुम्हारी लालच की कोई सीमा नहीं है। पहले देख तो लो कि अंदर है क्या।

नरेशन : राजा ने संदूक के अंदर हाथ डाला। दरबार में बैठे सभी लोग अपनी जगह से थोड़ा आगे झुक गए। राजा ने संदूक से एक बहुत ही पुराना, मिट्टी का बना हुआ एक छोटा सा कलश (Pot) निकाला, जिसका मुंह एक लाल कपड़े से बंधा हुआ था। और साथ में एक भोजपत्र (पुराना कागज) था।

जगन : (निराशा से मुंह बनाते हुए) हैं, मिट्टी का बर्तन, बस, इतनी मेहनत, इतनी लड़ाई और मिला क्या, एक मिट्टी का बर्तन, धिक्कार है। मुझे लगा था कोई खजाना होगा। महाराज, यह तो कबाड़ है कबाड़। यह माधव ही रख ले, मुझे नहीं चाहिए यह मिट्टी।

राजगुरु देवदत्त : (गंभीर स्वर में) मूर्ख मत बनो जगन। हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती और हर मिट्टी बेकार नहीं होती। यह साधारण कलश नहीं है।

माधव : राजगुरु जी, मुझे समझ नहीं आ रहा। मेरे लिए तो यह मिट्टी का कलश भी सोने से कम नहीं है क्योंकि यह ईमानदारी का फल है। पर इसमें है क्या,

राजगुरु देवदत्त : राजन, उस भोजपत्र को पढ़िए। उसमें इस कलश का रहस्य छिपा है।

राजा रणजीत सिंह : (भोजपत्र पढ़ते हुए) इसमें लिखा है - "यह पात्र 'अक्षय बीज' का है। यह बीज उसी के हाथों से फल देगा जिसका मन गंगा के पानी जैसा पवित्र होगा। अगर इसे किसी लालची ने बोया, तो यह विनाश लाएगा, लेकिन अगर किसी निस्वार्थ व्यक्ति ने इसे बोया, तो यह ऐसी फसल देगा जो पूरे राज्य की भूख मिटा सकेगी।"

नरेशन : यह सुनकर माधव की आंखों में चमक आ गई, लेकिन जगन अभी भी नाक-भौं सिकोड़ रहा था। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि एक बीज खजाने से बड़ा कैसे हो सकता है।

राजा रणजीत सिंह : माधव, आज से यह 'अक्षय बीज' तुम्हारा है। जाओ, इसे अपनी जमीन में बो दो। अगर तुम्हारा मन सच में साफ है, तो हम चमत्कार देखेंगे। और जगन, तुम आज़ाद हो, लेकिन याद रखना, अगर तुमने माधव को परेशान किया तो इस बार सीधे कालकोठरी में जाओगे।

जगन : जी महाराज, जी। मुझे क्या पड़ी है इस मिट्टी के बीज के पीछे पड़ने की। मैं तो जा रहा हूं अपनी हवेली।

नरेशन : जगन वहां से चला तो गया, लेकिन उसके दिमाग में शैतानी खुराफात शुरू हो चुकी थी। वो सोच रहा था कि अगर यह जादुई बीज है, तो इससे उगने वाला पेड़ जरूर सोने का होगा। माधव खुशी-खुशी कलश लेकर अपने घर की ओर चल पड़ा।

Scene 12 जगन की हवेली का अंधेरा कमरा 

नरेशन : रात हो चुकी थी। जगन अपनी हवेली में बेचैनी से टहल रहा था। कालू कोने में खड़ा होकर अपने मालिक के गुस्से के शांत होने का इंतजार कर रहा था। जगन बार-बार अपने हाथों को मल रहा था।

जगन : कालू, तूने सुना राजा ने क्या कहा, अक्षय बीज, जादुई बीज, मेरा मन कह रहा है कि वो साधारण अनाज का बीज नहीं है।

कालू : लेकिन मालिक, वो तो मिट्टी का कलश था। उसमें क्या रखा होगा, क्यों बेकार में मुसीबत मोल ले रहे हो। राजा जी ने चेतावनी दी है, अगर पकड़े गए तो गर्दन उड़ा देंगे।

जगन : अबे गधे, तू गधा ही रहेगा। सोच जरा, अगर वो बीज जादुई है और राजा ने उसे इतना संभाल कर रखा था, तो जरूर वो पेड़ सोने के फल देता होगा। या फिर उसमें हीरे उगते होंगे। और वो माधव, वो दो कौड़ी का लकड़हारा उस बेशकीमती बीज को अपनी बंजर जमीन में गाड़ देगा। नहीं, मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।

कालू : तो आप क्या करने वाले हैं मालिक, क्या हम उसे चुरा लें,

जगन : नहीं, चुराएंगे तो राजा को पता चल जाएगा। हम कुछ ऐसा करेंगे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। सुन, आज रात जब माधव सो जाएगा, हम उसके खेत में जाएंगे। जैसे ही वो बीज को जमीन में दबाएगा, हम उस पर नज़र रखेंगे। अगर वो पेड़ उगता है, तो हम उस जमीन पर कब्जा कर लेंगे।

कालू : कब्जा, वो कैसे मालिक,

जगन : अरे बेवकूफ, माधव की जमीन के कागज तो मेरे पास गिरवी रखे हैं न, सालों पहले पिताजी के समय के। मैंने उसे बताया नहीं था, लेकिन कानूनी तौर पर वो खेत अब भी मेरे नाम पर हो सकता है अगर मैं पुराने कागज निकाल लूं। कल सुबह मैं मुनीम से वो पुराने दस्तावेज निकलवाता हूं। तब तक तू जा और माधव के घर की जासूसी कर। देख वो बीज का क्या करता है।

नरेशन : लालच ने जगन की बुद्धि पूरी तरह भ्रष्ट कर दी थी। वो अपने सगे भाई को बर्बाद करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था। उधर माधव और कुसुम उस कलश को भगवान की मूर्ति की तरह पूज रहे थे।

Scene 13 माधव का छोटा सा खेत 

नरेशन : अगली सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही माधव अपने छोटे और सूखे पड़े खेत में पहुंच गया। उसके साथ कुसुम और गोलू भी थे। गोलू अब थोड़ा ठीक लग रहा था। माधव ने जमीन में एक छोटा सा गड्ढा खोदा।

माधव : हे धरती मां, मैं यह बीज लालच के लिए नहीं बो रहा हूं। मेरे पास धन नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूं कि मेरे गांव में कोई भूखा न सोए। अगर इस बीज में सच में कोई जादू है, तो बस इतना करना कि इससे इतना अनाज निकले कि सबका पेट भर जाए।

कुसुम : आप ठीक कह रहे हैं। हमें सोना-चांदी नहीं चाहिए। बस दो वक्त की रोटी इज्जत से मिल जाए, वही बहुत है। बो दीजिए इसे।

नरेशन : माधव ने कांपते हाथों से कलश खोला और उसके अंदर से एक चमकीला, नीले रंग का बीज निकाला। जैसे ही उसने बीज को मिट्टी में डाला और ऊपर से पानी दिया, जमीन के अंदर से एक हल्की कंपन महसूस हुई।

गोलू : बाबा, बाबा देखो, जमीन हिल रही है, वहां देखो,

नरेशन : देखते ही देखते, मिट्टी फटी और वहां से एक नन्हा पौधा बाहर निकला। और वो पौधा रुका नहीं। वो बढ़ता गया, बढ़ता गया। सबकी आंखों के सामने, महज कुछ ही पलों में वो पौधा एक विशालकाय वृक्ष बन गया। उसकी पत्तियां पन्ने (Emerald) जैसी हरी थीं और तना चंदन जैसा खुशबूदार।

माधव : हे ईश्वर, यह तो चमत्कार है, यह तो सच में जादुई है।

नरेशन : और फिर उस पेड़ पर फल लगने शुरू हुए। लेकिन वो आम या सेब नहीं थे। वो बड़े-बड़े सुनहरे रंग के फल थे जो देखने में ही दिव्य लग रहे थे। एक फल पककर नीचे गिरा और खुद-ब-खुद टूट गया। उसके अंदर से ढेर सारा अनाज और आटा निकला।

कुसुम : अरे, यह क्या, इस फल के अंदर तो पका-पकाया अनाज है,

माधव : (हैरानी से) इसका मतलब राजगुरु जी सत्य कह रहे थे। यह अक्षय पात्र जैसा पेड़ है। इससे हमें अनाज मिलेगा।

नरेशन : गांव के लोग यह चमत्कार देखकर दौड़ते हुए आए। माधव ने सबको रोका नहीं, बल्कि एक-एक फल तोड़कर सबको बांटना शुरू कर दिया। जिस गांव में कल तक भुखमरी थी, आज वहां हर घर में चूल्हा जल रहा था। लेकिन दूर झाड़ियों के पीछे छिपा कालू यह सब देख रहा था और उसकी आंखें फटी की फटी रह गई थीं। वो उल्टे पांव भागा जगन को खबर देने।

Scene 14 गांव के बीचों-बीच जगन की साजिश 

नरेशन : कालू ने जब जगन को सारी बात बताई तो जगन खुशी से पागल हो गया। उसे लगा कि अब वो दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाएगा।

जगन : क्या बात कर रहा है, अनाज निकलता है, अगर अनाज निकल सकता है तो सोना भी निकल सकता है। बस उसे उगाने का तरीका सही होना चाहिए। माधव तो बेवकूफ है, उसने अनाज मांगा होगा इसलिए अनाज मिला। मैं उस पेड़ से सोना मांगूंगा। कालू, जल्दी चल, मुनीम जी से वो पुराने कागज मिल गए हैं।

नरेशन : जगन अपने साथ चार-पांच लठैतों (गुंडों) को लेकर माधव के खेत पर पहुंचा। वहां गांव वालों की भीड़ लगी थी। जगन ने भीड़ को धक्का दिया और आगे आ गया।

जगन : हटो, हटो सब पीछे, यह क्या तमाशा लगा रखा है यहां। बंद करो यह सब।

माधव : भैया आप, देखिए न भगवान का चमत्कार। अब हमारे गांव में कोई भूखा नहीं रहेगा। आप भी ले जाइए थोड़ा अनाज।

जगन : (हाथ झटकते हुए) चुप कर भिखारी। मुझे तेरा यह सड़ा हुआ अनाज नहीं चाहिए। और यह पेड़, यह जिस जमीन पर उगा है, वो जमीन मेरी है।

नरेशन : जगन ने अपनी जेब से कुछ पुराने, पीला पड़ चुके कागज निकाले और उन्हें हवा में लहराया।

जगन : यह देखो, यह है सबूत। पिताजी ने मरने से पहले यह खेत मेरे नाम किया था। तूने बस अवैध कब्जा कर रखा था। कानूनी तौर पर यह पेड़ मेरा है, और इसका हर एक पत्ता मेरा है। हटो यहां से सब। खबरदार अगर किसी ने इस पेड़ को हाथ भी लगाया तो।

माधव : भैया यह आप क्या कह रहे हैं, पिताजी ने तो यह खेत मुझे दिया था ताकि मैं अपना गुजारा कर सकूं। आप इतना झूठ कैसे बोल सकते हैं,

जगन : जुबान लड़ाता है, कालू, इन सबको मार के भगा यहां से। और माधव, तू अपने बीवी-बच्चों को लेकर निकल जा यहां से। आज से यह जादुई पेड़ जगन सेठ का है।

नरेशन : गांव वाले डर गए क्योंकि जगन के पास गुंडे थे। माधव की आंखों में आंसू आ गए। उसने पेड़ की तरफ देखा, मानो उससे माफी मांग रहा हो कि वो उसकी रक्षा नहीं कर पाया। माधव ने झगड़ा नहीं किया, क्योंकि वो शांतिप्रिय था। वो चुपचाप पीछे हट गया।

कुसुम : आप कुछ बोल क्यों नहीं रहे, यह अन्याय है।

माधव : कुसुम, समय बड़ा बलवान होता है। अगर यह पेड़ सच का साथी है, तो यह अधर्मी के पास कभी नहीं टिकेगा। चलो यहां से।

Scene 15 जादुई पेड़ और जगन का लालच 

नरेशन : माधव और गांव वालों के जाने के बाद, जगन ने उस पेड़ को चारों तरफ से घेर लिया। वो खुशी से झूम रहा था। उसने पेड़ के तने को सहलाया।

जगन : आहा, अब आया है ऊंट पहाड़ के नीचे। अब तू मेरा है। सुन ए जादुई पेड़, मुझे पता है तू सब सुन सकता है। माधव ने तुझसे अनाज मांगा, क्योंकि वो छोटी सोच का है। लेकिन मैं, मैं जगन सेठ हूं। मुझे अनाज नहीं चाहिए। मुझे सोना चाहिए। ढेर सारा सोना। चल, अब अपने इन फलों को सोने में बदल दे।

नरेशन : जगन हुक्म चला रहा था। लेकिन पेड़ शांत खड़ा था। हवा भी नहीं चल रही थी।

जगन : (गुस्से में) सुना नहीं तूने, मैंने कहा सोना दे मुझे। अगर तूने सोना नहीं दिया तो मैं तुझे काट डालूंगा। कालू, मेरी कुल्हाड़ी ला।

कालू : मालिक, यह पेड़ तो देवता समान है, इसे काटने की बात मत करो, कहीं पाप न लग जाए।

जगन : पाप और पुण्य गरीबों के लिए होते हैं कालू। ला कुल्हाड़ी इधर।

नरेशन : जगन ने कालू के हाथ से कुल्हाड़ी छीनी और पूरे जोर से पेड़ के तने पर वार करने के लिए हाथ उठाया। "खटाक!" लेकिन यह क्या, कुल्हाड़ी पेड़ पर लगते ही रबर की तरह वापस उछल गई और जगन के हाथ झनझना गए। पेड़ पर एक खरोंच भी नहीं आई।

जगन : (बौखलाते हुए) अच्छा, तू बहुत सख्त है, रुक तुझे मैं अभी बताता हूं।

नरेशन : जगन ने दोबारा वार किया। इस बार पेड़ के अंदर से एक अजीब सी गूंज आई। और अचानक, पेड़ की जड़ें जमीन से बाहर निकल आईं। वो जड़ें किसी सांप की तरह रेंगती हुई जगन के पैरों की तरफ बढ़ीं।

कालू : मालिक, भागो, मालिक पीछे देखो, जड़ें आपको पकड़ने आ रही हैं,

जगन : क्या बकवास कर रहा है, जड़ें कैसे चल सकती... अरे बाप रे,

नरेशन : इससे पहले कि जगन कुछ समझ पाता, पेड़ की मोटी जड़ों ने जगन के पैरों को जकड़ लिया और उसे हवा में उल्टा लटका दिया। जगन चीखने लगा।

जगन : बचाओ, कालू बचाओ मुझे, यह राक्षस है, यह पेड़ नहीं राक्षस है,

कालू : (डरकर पीछे भागते हुए) मालिक, मैंने कहा था न यह जादुई है। मैं जा रहा हूं, मुझे अपनी जान प्यारी है।

Scene 16 माधव की वापसी और क्षमादान l

नरेशन : कालू भागता हुआ सीधा माधव के पास गया। माधव अपनी झोपड़ी के बाहर उदास बैठा था।

कालू : माधव भैया, अनर्थ हो गया, अनर्थ हो गया। उस पेड़ ने मालिक को पकड़ लिया है। वो उन्हें खा जाएगा भैया, चलिए जल्दी, मालिक को बचाइए।

माधव : (चौंकते हुए) क्या, भैया मुसीबत में हैं, कुसुम, तू यहीं रुक, मैं अभी आता हूं।

कुसुम : नहीं, आप वहां मत जाइए। उन्होंने आपके साथ इतना बुरा किया, उन्हें अपने कर्मों की सजा मिल रही है।

माधव : नहीं कुसुम, वो मेरे बड़े भाई हैं। चाहे वो कैसे भी हों, मैं उन्हें मरते हुए नहीं देख सकता। मेरा धर्म मुझे यह नहीं सिखाता कि मुसीबत में पड़े दुश्मन को छोड़ दिया जाए।

नरेशन : माधव दौड़ता हुआ खेत पर पहुंचा। वहां का नज़ारा भयानक था। जगन हवा में उल्टा लटका था और चिल्ला रहा था। पेड़ की डालियां उसे कसती जा रही थीं।

जगन : माधव, माधव मेरे भाई, मुझे बचा ले। मुझसे गलती हो गई। मैं बहुत बुरा इंसान हूं। मुझे माफ कर दे भाई। मुझे नीचे उतार दे, मैं तुझे तेरी सारी जमीन वापस दे दूंगा। मैं लिख कर देता हूं।

माधव : भैया, आप चिंता मत करो। मैं आ गया हूं।

नरेशन : माधव धीरे-धीरे पेड़ के पास गया। उसने पेड़ के तने पर प्यार से हाथ रखा और आंखें बंद कर लीं।

माधव : हे वृक्ष देवता, मेरे भाई को क्षमा कर दो। यह अज्ञानी है। लालच ने इनकी बुद्धि हर ली थी। लेकिन यह है तो मेरा ही खून। अगर आप मेरी भक्ति और ईमानदारी से प्रसन्न हैं, तो इन्हें छोड़ दीजिए। इन्हें एक मौका और दीजिए सुधरने का।

नरेशन : माधव के स्पर्श करते ही पेड़ का गुस्सा जैसे शांत हो गया। जो जड़ें लोहे जैसी सख्त थीं, वो एकदम नरम हो गईं। पेड़ ने धीरे से जगन को जमीन पर उतार दिया। जगन जमीन पर गिरते ही माधव के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा।

जगन : मुझे माफ कर दे माधव। मैं इंसान नहीं हैवान बन गया था। तूने आज न सिर्फ मेरी जान बचाई है, बल्कि मेरी आत्मा को भी जगा दिया है। मैं वादा करता हूं, आज के बाद मैं कभी किसी गरीब को नहीं सताऊंगा। यह खेत, यह पेड़ और मेरी आधी संपत्ति, सब तेरी है।

माधव : भैया, मुझे संपत्ति नहीं चाहिए। मुझे बस मेरा भाई वापस चाहिए था। उठिए, आप बड़े हैं, मेरे पैरों में मत गिरिए।

Scene 17 राजा का आगमन और गांव का कायापलट 

नरेशन : तभी वहां घोड़ों की टाप सुनाई दी। राजा रणजीत सिंह और राजगुरु वहां पहुंच गए। उन्हें कालू ने रास्ते में ही रोककर सब बता दिया था।

राजा रणजीत सिंह : वाह माधव, वाह। आज तुमने सिद्ध कर दिया कि संदूक की पहेली का उत्तर तुमने तुक्के में नहीं दिया था। सच में, ज्ञान और ईमानदारी से बड़ा कोई धन नहीं है। तुमने अपने शत्रु को भी क्षमा कर दिया।

राजगुरु देवदत्त : राजन, यह पेड़ भी इसी बात की परीक्षा ले रहा था। यह 'कल्पवृक्ष' का ही एक अंश है। यह सिर्फ उसी जगह फल देगा जहां प्रेम और त्याग होगा। अगर जगन इसे अपने पास रखता, तो यह कांटेदार झाड़ी बन जाता।

राजा रणजीत सिंह : जगन, तुम्हारे कर्म तो ऐसे हैं कि तुम्हें देश निकाला दे देना चाहिए। लेकिन तुम्हारे भाई के प्रेम ने तुम्हें बचा लिया।

जगन : महाराज, मैं बहुत शर्मिंदा हूं। मैं अपना प्रायश्चित करना चाहता हूं। मैं अपनी हवेली का अनाज भंडार आज ही पूरे गांव के लिए खोल दूंगा।

राजा रणजीत सिंह : ठीक है। अगर तुम सुधर गए हो तो यह अच्छी बात है। माधव, आज से तुम इस गांव के मुखिया हो। यह जादुई पेड़ तुम्हारी देखरेख में रहेगा। इसका उपयोग तुम गांव की भलाई के लिए करना।

माधव : जी महाराज। आपकी आज्ञा का पालन होगा।

नरेशन : और उस दिन के बाद से, सोनपुर गांव की तकदीर बदल गई। उस जादुई पेड़ ने न सिर्फ अनाज दिया, बल्कि जब गांव में कोई बीमार होता, तो उसके फलों के रस से वो ठीक हो जाता। माधव ने कभी उस पेड़ का व्यापार नहीं किया। जगन भी अब बदल चुका था, वो माधव के साथ मिलकर खेतों में काम करता और गांव की सेवा करता।

Scene 18 कहानी का सुखद अंत (Conclusion)

नरेशन : समय बीतता गया। गोलू अब बड़ा हो रहा था, लेकिन उसने कभी भी अमीरी का घमंड नहीं किया क्योंकि उसने अपने पिता से सीखा था कि असली अमीर वो है जिसका दिल बड़ा हो। वो जादुई पेड़ आज भी वहां खड़ा है, इस बात की गवाही देता हुआ कि दुनिया में लालच हार जाता है और ईमानदारी की जीत होती है।

माधव अक्सर उस पेड़ के नीचे बैठकर गांव के बच्चों को यही कहानी सुनाता था कि कैसे एक सूखी रोटी, चोरी के पकवान से ज्यादा मीठी होती है।

कहानी हमें यही सिखाती है कि मुसीबत चाहे कितनी भी बड़ी हो, अगर हम अपने वसूलों और ईमानदारी पर डटे रहें, तो कुदरत भी झुककर हमारी मदद करती है। भूख पेट की हो सकती है, लेकिन ईमान आत्मा का होता है। और आत्मा की आवाज कभी गलत नहीं होती।

THE END


✍️ Script by: Govind Gurjar 

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