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भूख से भी बड़ा था उसका ईमान
कहानी के पात्र:
माधव: एक बेहद गरीब, मेहनती और ईमानदार लकड़हारा। जो अपनी मेहनत की रोटी पर विश्वास करता है।
कुसुम: माधव की पत्नी, जो गरीबी में भी अपने पति का साथ नहीं छोड़ती।
गोलू: माधव का 6 साल का बेटा, जो भूख और ठंड से बेहाल है।
जगन: माधव का बड़ा भाई। बेहद लालची, अमीर और क्रूर स्वभाव का।
चमेली: जगन की पत्नी, जो जगन की तरह ही घमंडी है।
महाराज रणजीत सिंह: राज्य के न्यायप्रिय राजा, जो भेष बदलकर प्रजा का हाल जानते हैं।
सेनापति विक्रम: राजा का वफादार।
कालू: गाँव का एक चालाक व्यक्ति जो जगन का चमचा है।
कहानी की शुरुआत
Scene 1 माधव का टूटा-फूटा घर
नरेशन: ठंड का मौसम था। हवा इतनी तेज थी कि मानो हड्डियों को चीर दे। पूरे 'सोनपुर' गाँव में सन्नाटा पसरा हुआ था। लोग अपने-अपने घरों में रजाई में दुबके हुए थे। लेकिन गाँव के एक कोने में, एक टूटी हुई झोपड़ी के अंदर का हाल बहुत बुरा था। यह घर था माधव का। छत से टपकती हुई ओस और दीवारों में दरारें इस ठंड को और जानलेवा बना रही थीं।
गोलू: (कांपते हुए और रोते हुए) माँ... माँ बहुत ठंड लग रही है माँ... मेरे हाथ-पैर काम नहीं कर रहे... माँ कुछ करो न... मुझे भूख भी लगी है।
कुसुम: (आंखों में आंसू लिए, गोलू को अपनी फटी हुई साड़ी के पल्लू से ढकते हुए कहेता है कि) बस बेटा... बस थोड़ी देर और रुक जा। तेरे बापू अभी आते ही होंगे। वो जरूर कुछ न कुछ लेकर आएंगे। तू रो मत मेरे लाल... अगर तू रोएगा तो मेरी हिम्मत टूट जाएगी।
गोलू: माँ, कल भी बापू खाली हाथ आए थे... आज भी अगर वो कुछ नहीं लाए तो? पेट में बहुत दर्द हो रहा है माँ... ऐसा लग रहा है चूहे दौड़ रहे हैं।
नरेशन: कुसुम के पास अपने बेटे के सवालों का कोई जवाब नहीं था। घर के एक कोने में चूल्हा तो था, लेकिन वो पिछले दो दिनों से ठंडा पड़ा था। न लकड़ी थी जलाने को, न अनाज था पकाने को। तभी दरवाजे की चरमराती हुई आवाज आती है और माधव अंदर आता है। माधव के कपड़े जगह-जगह से फटे हुए थे और वो ठंड से बुरी तरह कांप रहा था।
कुसुम: (जल्दी से माधव के पास जाते हुए) आप आ गए? कुछ मिला? क्या हुआ? आप इतना कांप क्यों रहे हैं?
माधव: (निराशा से सिर झुकाते हुए) नहीं कुसुम... आज भी कुछ नहीं मिला। इतनी ठंड में कोई लकड़ी खरीदने को तैयार ही नहीं है। सब अपने घरों में बंद हैं। और जंगल की लकड़ियां इतनी गीली हैं कि वो जलेंगी ही नहीं। मैं... मैं हार गया हूँ कुसुम।
कुसुम: ऐसा मत बोलिए। अगर आप हिम्मत हार जाएंगे तो हम सबका क्या होगा? देखिए गोलू की हालत... उसका बदन तप रहा है। अगर आज रात हमने आग नहीं जलाई और उसे कुछ खिलाया नहीं, तो अनहोनी हो जाएगी।
माधव: जानता हूँ कुसुम, सब जानता हूँ। एक पिता होकर भी मैं कितना लाचार हूँ। (दीवार पर मुक्का मारते हुए) धिक्कार है मेरी ऐसी जिंदगी पर! जो अपने बच्चे को दो वक्त की रोटी और गर्मी नहीं दे सकता।
कुसुम: सुनिए, एक रास्ता है। आप... आप बड़े भैया जगन के पास क्यों नहीं जाते? वो तो इतने अमीर हैं, उनके पास तो गोदाम भरा पड़ा है लकड़ियों और अनाज से। वो आपके सगे भाई हैं, इस मुश्किल वक्त में मना नहीं करेंगे।
माधव: (गुस्से और दुख के साथ) जगन? वो मेरा भाई सिर्फ नाम का है कुसुम। तुम तो जानती हो, जब पिताजी गुजरे थे तो उसने कैसे धोखे से सारी जमीन-जायदाद अपने नाम कर ली थी और हमें इस टूटी झोपड़ी में फेंक दिया था। वो मुझे फूटी कौड़ी नहीं देगा।
कुसुम: मैं जानती हूँ, लेकिन अभी हमारे पास और कोई रास्ता नहीं है। अपनी इज्जत को एक तरफ रख दीजिए, बस गोलू के चेहरे को देखिए। शायद... शायद उनके दिल में थोड़ी दया बची हो? एक बार कोशिश करने में क्या जाता है?
माधव: (गोलू की तरफ देखता है जो ठंड से सिकुड़ा हुआ था) ठीक है कुसुम। तुम सही कह रही हो। अपने बच्चे की जान बचाने के लिए अगर मुझे जगन के पैरों में भी गिरना पड़े, तो मैं गिरूँगा। मैं अभी जाता हूँ।
नरेशन: माधव भारी कदमों से, अपनी आत्मसम्मान को कुचलकर, अपने अमीर भाई जगन की हवेली की तरफ निकल पड़ता है। बाहर तूफानी हवाएं चल रही थीं, लेकिन माधव के दिल में अपने बेटे को बचाने की आग जल रही थी।
Scene 2 जगन की हवेली का बाहरी हिस्सा
नरेशन: माधव चलते-चलते जगन की विशाल हवेली के सामने पहुँचता है। हवेली के अंदर से गर्म रोशनी आ रही थी और पकवानों की खुशबू माधव की नाक में दम कर रही थी। माधव ने डरते-डरते दरवाजा खटखटाया।
माधव: (ऊंची आवाज में) भाईसाहब! जगन भैया! दरवाजा खोलिए!
नरेशन: थोड़ी देर बाद दरवाजा खुलता है। सामने जगन खड़ा था, जिसने एक मोटा ऊनी शॉल ओढ़ा हुआ था और हाथ में गर्म दूध का गिलास था। जगन ने माधव को ऊपर से नीचे तक घृणा से देखा।
जगन: अरे! यह कौन आ गया सुबह-सुबह? ओहो... तुम? माधव? क्या बात है, आज रास्ता कैसे भूल गया? या फिर भीख मांगने आया है?
माधव: (हाथ जोड़ते हुए) भैया, मैं भीख मांगने नहीं आया। बस... बस थोड़ी मदद चाहिए। गोलू बहुत बीमार है, घर में खाने को एक दाना नहीं है और ठंड से हम सब मर जाएंगे। बस थोड़ी सी सूखी लकड़ियां और मुट्ठी भर अनाज दे दो। मैं वादा करता हूँ, जैसे ही मौसम खुलेगा, मैं आपकी एक-एक पाई मेहनत करके चुका दूंगा।
जगन: (जोर से हँसते हुए) हा हा हा! सुन रही हो चमेली? जरा बाहर आओ, देखो हमारा 'ईमानदार' भाई क्या कह रहा है।
नरेशन: चमेली अंदर से आती है, मुंह में पान चबाते हुए।
चमेली: अरे, यह फिर आ गया? मैंने तो पहले ही कहा था, इन गरीबों की आदत ही होती है हाथ फैलाने की। क्यों जी, क्या मांग रहा है अब यह?
जगन: कह रहा है उधार चाहिए। चुका देगा! (माधव की ओर देखते हुए) अरे माधव, तेरी हैसियत क्या है जो तू मेरा उधार चुकाएगा? दो दिन की रोटी का तो ठिकाना नहीं है तेरा। और तू मुझसे लकड़ियां मांग रहा है? मेरी लकड़ियां बाजार में ऊंचे दाम पर बिकती हैं, मुफ्त में बांटने के लिए नहीं हैं।
माधव: भैया, मैं मुफ्त में नहीं मांग रहा। मैं आपके खेतों में मजदूरी कर लूंगा, आपके घर का सारा काम कर दूंगा। बस आज मेरे बच्चे की जान बचा लो। वो ठंड से मर जाएगा भैया। आप तो ताऊ लगते हो उसके, कुछ तो रहम करो।
जगन: (गुस्से से) खबरदार जो रिश्ता जोड़ने की कोशिश की! मेरा और तेरा कोई रिश्ता नहीं है। तू एक नालायक और दरिद्र है। निकल जा यहाँ से! अगर दोबारा मेरे दरवाजे पर दिखा, तो कुत्तों से नोचवा दूंगा।
चमेली: सही कह रहे हैं। और सुन माधव, अगर तुझे लकड़ियां चाहिए ही, तो वो सामने 'काली घाटी' वाला जंगल है न? वहां क्यों नहीं जाता? सुना है वहां बहुत पुरानी और सूखी लकड़ियां मिलती हैं।
माधव: (हैरान होकर) काली घाटी? भाभी, आप तो जानती हैं वो शापित जंगल है। वहां जंगली जानवर और... और अजीबोगरीब खतरा है। वहां जाने वाला कभी वापस नहीं आता। आप मुझे मौत के मुंह में क्यों भेज रही हैं?
जगन: तो मर जा! यहाँ मेरे दरवाजे पर खड़े होकर मेरा दिमाग मत खा। या तो उस जंगल में जा, या फिर अपने परिवार के साथ ठंड में ठिठुर कर मर जा। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। (जोर से) निकल यहाँ से!
नरेशन: जगन ने जोर से दरवाजा माधव के मुंह पर बंद कर दिया। "धड़ाम" की आवाज ने माधव के दिल के टुकड़े कर दिए। माधव वहीं जमीन पर कुछ पल के लिए सन्न रह गया। उसकी आंखों से आंसू बह निकले। लेकिन फिर उसे गोलू का चेहरा याद आया।
माधव: (खुद से बात करते हुए) नहीं... मैं हार नहीं मान सकता। जगन भैया ने सही कहा, अगर मुझे अपने परिवार को बचाना है, तो मुझे खतरा उठाना ही होगा। मैं काली घाटी जाऊंगा। चाहे मेरी जान चली जाए, लेकिन आज मैं खाली हाथ घर नहीं लौटूंगा।
Scene 3 काली घाटी का डरावना जंगल
नरेशन: माधव ने अपना पुराना कुल्हाड़ा उठाया और गाँव के दूसरी तरफ स्थित 'काली घाटी' की ओर चल पड़ा। जैसे-जैसे वो जंगल के करीब पहुँच रहा था, हवाओं की आवाज और भी डरावनी होती जा रही थी। वहां के पेड़ काले और सूखे थे, मानो वर्षों से वहां सूरज की रोशनी न पड़ी हो।
माधव: (डरते हुए, चारों तरफ देखते हुए) हे भगवान, मेरी रक्षा करना। मैं यह सब लालच के लिए नहीं, अपनी मजबूरी के लिए कर रहा हूँ। यहाँ तो इतनी खामोशी है कि अपनी सांसों की आवाज भी डरावनी लग रही है।
नरेशन: माधव जंगल के अंदर घुसता गया। उसे सूखी लकड़ियां तो दिख रही थीं, लेकिन अजीब बात यह थी कि उन लकड़ियों को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उन्हें जानबूझकर वहां सजाया हो। माधव ने एक बड़े पेड़ के पास जाकर अपनी कुल्हाड़ी उठाई।
माधव: चलो, यह पेड़ काफी सूखा लग रहा है। इसकी लकड़ियां मेरे परिवार को हफ्तों तक गर्मी देंगी।
नरेशन: जैसे ही माधव ने पहला वार पेड़ पर किया "खट!", जंगल में अजीब सी गूंज हुई। तभी माधव की नजर पास ही पड़ी एक झाड़ी के पीछे गई। वहां कुछ चमक रहा था। बर्फ और सूखी पत्तियों के बीच कुछ सुनहरा सा।
माधव: अरे? वह क्या है? इतनी अंधेरी जगह में रोशनी कैसी?
नरेशन: माधव ने लकड़ी काटना छोड़ा और धीरे-धीरे उस चमकती हुई चीज की तरफ बढ़ा। उसने झाड़ियों को हटाया तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वहां एक पुराना, लेकिन बेहद कीमती दिखने वाला संदूक (Box) पड़ा था। उस पर राजसी मुहर लगी थी।
माधव: यह... यह तो कोई खजाना लगता है। लेकिन यह यहाँ इस वीराने में कैसे आया? (संदूक को छूते हुए) यह तो बहुत भारी है। अगर इसमें सोना हुआ तो?
नरेशन: माधव का मन एक पल के लिए डोल गया। उसने सोचा कि अगर वो इसे ले ले, तो उसकी गरीबी हमेशा के लिए मिट जाएगी। वो जगन के मुंह पर तमाचा मार सकता है। लेकिन तभी उसके पिता की दी हुई सीख उसे याद आ गई।
माधव: (सिर झटकते हुए) नहीं... नहीं माधव। यह तेरा नहीं है। पराये धन पर हक़ जमाना पाप है। मेरे बापू ने कहा था, "ईमान की सूखी रोटी, बेईमानी की खीर से हजार गुना बेहतर है।" लेकिन... लेकिन गोलू? वो भूख से मर रहा है।
नरेशन: माधव बहुत बड़ी दुविधा में था। एक तरफ उसका ईमान था और दूसरी तरफ उसकी मजबूरी। उसने संदूक को खोलने की कोशिश नहीं की। उसने सोचा कि वो इसे राजा के पास ले जाएगा, शायद राजा उसे ईमानदारी का कुछ इनाम दे दें। तभी उसे पीछे से किसी के पैरों की आवाज सुनाई दी।
आवाज: (पीछे से भारी आवाज) तो आखिरकार तुम्हें यह मिल ही गया, लकड़हारे!
माधव: (चौंककर पीछे मुड़ते हुए) कौन? कौन है वहाँ? सामने आओ!
Scene 4 जंगल के बीचो-बीच
नरेशन: पेड़ों के पीछे से एक बूढ़ा व्यक्ति बाहर निकला। उसके कपड़े फटे हुए थे, लेकिन आंखों में एक अजीब सा तेज था। उसके हाथ में एक टेढ़ी-मेढ़ी लाठी थी।
बूढ़ा व्यक्ति: डरो मत बेटा। मैं इसी जंगल में रहता हूँ। मैं देख रहा था कि तुम काफी देर से लकड़ियां काटने की कोशिश कर रहे हो। लेकिन तुम्हारी किस्मत तुम्हें इस संदूक तक ले आई।
माधव: बाबा, प्रणाम। मैं... मैं तो बस लकड़ी लेने आया था। मुझे नहीं पता यह संदूक किसका है। मैं इसे हाथ नहीं लगाऊंगा।
बूढ़ा व्यक्ति: (मुस्कुराते हुए) अरे मूर्ख! जानती हो इस संदूक में क्या है? इसमें इतना सोना और हीरे हैं कि तेरा पूरा गाँव सात पुश्तों तक बैठकर खा सकता है। इसे उठा, और भाग जा। यहाँ कोई देखने वाला नहीं है। भगवान ने तेरी गरीबी देखकर ही तुझे यह दिया है।
माधव: नहीं बाबा। यह मेरा नहीं है। और जो मेरा नहीं है, उसे मैं अपने घर कैसे ले जा सकता हूँ? अगर मैंने इस चोरी के धन से अपने बच्चे को खाना खिलाया, तो वो खाना उसके पेट में जहर बन जाएगा। मुझे बस लकड़ियां चाहिए।
बूढ़ा व्यक्ति: सोच ले माधव! घर पर बीवी-बच्चे भूखे हैं। क्या तू उन्हें यह संदूक दिखाकर खुश नहीं करना चाहता? दुनिया में ईमानदारी सिर्फ किताबों में अच्छी लगती है। पेट की भूख के सामने सब सिद्धांत झूठे पड़ जाते हैं।
माधव: (दृढ़ता से) पेट की भूख मिट जाएगी बाबा, आज नहीं तो कल। लेकिन अगर आज मेरा ईमान मर गया, तो मैं अपनी नजरों में कभी नहीं उठ पाऊंगा। मैं इस संदूक को राजा साहब के पास पहुंचाऊंगा। वही इसके असली मालिक हैं, क्योंकि इस पर राजमुहर लगी है।
नरेशन: बूढ़े व्यक्ति की आंखों में एक चमक आ गई। वास्तव में, यह कोई साधारण बूढ़ा नहीं था, बल्कि राजा के गुप्तचरों का प्रमुख था जो वेश बदलकर सीमा की सुरक्षा जाँच रहा था, या शायद कोई और ही रहस्य था।
बूढ़ा व्यक्ति: ठीक है। अगर तेरी यही जिद है तो ले जा इसे। लेकिन याद रखना, यह जंगल खतरों से खाली नहीं है। और... (रहस्यमयी ढंग से) कभी-कभी जो दिखता है, वो होता नहीं है।
नरेशन: माधव ने अपनी कुल्हाड़ी एक हाथ में पकड़ी और दूसरे हाथ से उस भारी संदूक को उठाया। उसने कुछ सूखी लकड़ियां भी अपनी पीठ पर लाद लीं।
माधव: धन्यवाद बाबा। आप भी इस ठंड में यहाँ मत रहिए। गाँव चलिए मेरे साथ।
बूढ़ा व्यक्ति: तू जा बेटा... मेरा समय अभी नहीं आया।
नरेशन: माधव भारी कदमों से वापस गाँव की तरफ चल पड़ा। लेकिन उसे पता नहीं था कि जंगल के किनारे पर कोई और भी उसकी ताक में खड़ा था। वो कोई और नहीं, उसका लालची भाई जगन था। जगन ने माधव को जंगल में जाते हुए देख लिया था और उसके पीछे-पीछे आया था यह देखने के लिए कि क्या माधव सच में मर गया या उसे कुछ मिला।
Scene 5 जंगल का किनारा
नरेशन: माधव जैसे ही जंगल से बाहर निकला, पसीने से लथपथ लेकिन चेहरे पर संतोष लिए हुए, अचानक जगन और उसका नौकर कालू उसके सामने आ खड़े हुए। जगन की नजरें सीधे उस चमकते हुए संदूक पर गड़ी थीं।
जगन: (आश्चर्य और लालच से) अरे वाह! वाह भाई माधव! मैं तो तुझे बेवकूफ समझता था, लेकिन तू तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला। मैंने तुझे मरने भेजा था और तू खजाना लेकर आ गया?
माधव: (घबराते हुए) भैया आप? आप यहाँ क्या कर रहे हैं?
कालू: (जगन के कान में फुसफुसाते हुए) मालिक, देख रहे हैं? शाही संदूक है। पक्का इसमें सोने की मोहरें होंगी। आज तो आपकी लॉटरी लग गई।
जगन: (माधव के करीब आते हुए) ला, यह संदूक मुझे दे दे। मैं तेरा बड़ा भाई हूँ, घर का मुखिया हूँ। ऐसी कीमती चीजों की देखभाल करना मेरा हक है। तू बच्चा है, इसे संभाल नहीं पाएगा।
माधव: (पीछे हटते हुए) नहीं भैया। यह न मेरा है, न आपका। यह राजा का है। इस पर राजमुहर लगी है। मैं इसे सीधा राजमहल जमा कराने जा रहा हूँ।
जगन: (गुस्से से) अबे ओ हरिश्चंद्र की औलाद! दिमाग खराब है तेरा? राजा को देगा? राजा के पास पहले ही बहुत धन है। यह भगवान ने हमें दिया है। आधा मेरा, आधा तेरा। बोल मंजूर है? देख, इससे तू अमीर हो जाएगा। तेरा गोलू रजाई में सोएगा, घी-रोटी खाएगा।
माधव: भैया, मैंने कहा न, मुझे यह पाप नहीं करना। गोलू भूखा रह लेगा, लेकिन चोरी का नहीं खाएगा। हटिए रास्ते से।
जगन: (अपना असली रूप दिखाते हुए) कालू! पकड़ इस नालायक को। आज मैं इसे बताता हूँ कि बड़े भाई की बात टालने का क्या अंजाम होता है। छीन ले इससे संदूक!
नरेशन: कालू ने झपट्टा मारकर माधव को पकड़ लिया। माधव कमजोर था, लेकिन उसने संदूक को कसकर पकड़ रखा था।
माधव: छोड़ो मुझे! कालू, यह गलत है! भैया, आप पाप कर रहे हैं!
जगन: पाप और पुण्य अमीरों के चोचले हैं माधव। मुझे यह संदूक चाहिए, मतलब चाहिए! (जगन माधव के हाथ से संदूक खींचने लगा)
नरेशन: छीना-झपटी में माधव गिर पड़ा। उसका सिर एक पत्थर से टकराया, जिससे खून निकलने लगा। लेकिन उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई।
माधव: (दर्द से कराहते हुए) मैं... मैं जान दे दूंगा, लेकिन यह संदूक तुम्हें नहीं दूंगा भैया।
जगन: तो जान ही दे दे!
नरेशन: जगन ने पास पड़ी एक लकड़ी उठाई और माधव के सिर पर मारने ही वाला था कि तभी... घोड़ों की टाप सुनाई दी। "टप-टप-टप-टप!"। जंगल की तरफ से मशालें लिए कुछ घुड़सवार तेजी से उनकी तरफ आ रहे थे।
कालू: (डरते हुए) मालिक! रुकिए! शाही सेना! राजा के सिपाही आ रहे हैं!
जगन: (घबराकर लकड़ी फेंकते हुए) क्या? इतनी रात को?
नरेशन: वो घुड़सवार कोई और नहीं, स्वयं राजा रणजीत सिंह और उनके सैनिक थे, जो उसी बूढ़े व्यक्ति (गुप्तचर) की सूचना पर वहां आए थे। राजा ने घोडा रोका और अपनी तलवार निकाली।
राजा रणजीत सिंह: (गरजते हुए) रुक जाओ! यह क्या हो रहा है यहाँ? एक निहत्थे पर वार करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती?
Scene 6 जंगल का किनारा (सस्पेंस और टकराव)
नरेशन: राजा रणजीत सिंह की कड़कड़ाती आवाज़ सुनकर जगन के पसीने छूट गए। उसके हाथ से लकड़ी छूटकर गिर गई। राजा अपने सफेद घोड़े से नीचे उतरे। उनकी आँखों में अंगारे दहक रहे थे। उनके पीछे दस हथियारबंद सैनिक खड़े थे। कालू तो डर के मारे एक पेड़ के पीछे दुबक गया।
राजा रणजीत सिंह: (माधव को उठाते हुए बलता है) क्या नाम है तुम्हारा? और यह दुष्ट तुम पर हमला क्यों कर रहा था?
माधव: (सिर से बहते खून को पोछते हुए, कांपती आवाज़ में) म.. महाराज! मेरा नाम माधव है। और ये... ये मेरे बड़े भाई जगन हैं।
जगन: (तुरंत पैंतरा बदलते हुए, हाथ जोड़कर) महाराज की जय हो! अन्नदाता, आप गलत समझ रहे हैं। मैं तो... मैं तो बस अपने छोटे भाई की मदद कर रहा था। यह संदूक भारी है न, तो मैंने सोचा इसे उठा लूं। यह तो गिर गया था, इसलिए चोट लग गई। क्यों माधव, सही कह रहा हूँ न मैं? (जगन ने माधव को आंखें दिखाईं)
राजा: (व्यंग्य से मुस्कुराते हुए) मदद? मैंने अपनी आँखों से देखा तुम इसके सिर पर वार करने वाले थे। और यह संदूक? यह तुम्हारे पास कहाँ से आया?
माधव: महाराज, यह मुझे काली घाटी के जंगल में मिला। मैं लकड़ियां काटने गया था। इस पर राजमुहर लगी है, इसलिए मैं इसे आपके पास ही ला रहा था। लेकिन भैया... भैया इसे खुद रखना चाहते थे।
जगन: झूठ! सफेद झूठ महाराज! यह संदूक मेरा है। हमारे पूर्वजों का है। यह माधव इसे चुराकर भाग रहा था। मैं तो अपनी पुश्तैनी जायदाद बचाने आया था। यह चोर है महाराज, चोर!
राजा: (सैनिकों की ओर इशारा करते हुए) खामोश! किसका सच है और किसका झूठ, इसका फैसला यहाँ जंगल में नहीं, कल सुबह राजदरबार में होगा। सेनापति!
सेनापति विक्रम: जी महाराज!
राजा: इस संदूक को शाही खजाने में जमा कराओ। और इन दोनों को कल सुबह दरबार में हाज़िर होने का आदेश दो। और हाँ, अगर कल तुम नहीं आए जगन, तो तुम्हें काल कोठरी में डाल दिया जाएगा।
जगन: (घबराते हुए कहेता है) जी... जी महाराज। मैं जरूर आऊंगा। आखिर यह मेरे पूर्वजों का संदूक है।
राजा: (माधव की ओर देखते हुए) और तुम... तुम्हें इलाज की जरूरत है। (राजा अपनी थैली से कुछ सोने के सिक्के निकालकर माधव की ओर बढ़ाते हैं) यह लो, इलाज करवा लेना और अपने बच्चे के लिए भोजन ले जाना। यह तुम्हारी ईमानदारी का इनाम नहीं, बल्कि तुम्हारी चोट का हर्जाना है। इनाम का फैसला कल होगा।
नरेशन: राजा और उनकी सेना संदूक लेकर चले गए। जगन ने माधव को एक ज़हरीली नज़र से देखा और अपने नौकर कालू के साथ वहाँ से चला गया। माधव ने वो सिक्के मुट्ठी में भींचे और लंगड़ाते हुए घर की ओर भागा। उसके पास राजा का दिया हुआ वचन था और मुट्ठी भर उम्मीद।
Scene 7 माधव का घर (भावुक दृश्य)
नरेशन: रात और गहरी हो चुकी थी। कुसुम दरवाजे पर बैठी माधव की राह देख रही थी। गोलू अब भी ठंड से सिकुड़ा हुआ सो रहा था। तभी माधव अंदर आया। उसके माथे पर जमा हुआ खून और फटे कपड़े देखकर कुसुम की चीख निकल गई।
कुसुम: (दौड़कर पास आते हुए) हे भगवान! यह क्या हालत बना ली आपने? यह खून... किसने मारा आपको? आप तो लकड़ी लाने गए थे?
माधव: (मुस्कुराते हुए, दर्द को छुपाते हुए बलता है) घबरा मत कुसुम। मैं ठीक हूँ। बस थोड़ी खरोंच है। देख, मैं क्या लाया हूँ।
नरेशन: माधव ने अपनी जेब से राजा के दिए हुए सोने के सिक्के और जंगल से लाई हुई सूखी लकड़ियां जमीन पर रख दीं। सोने के सिक्कों की खनक सुनकर कुसुम की आँखें फटी रह गईं।
कुसुम: यह... यह सोना? आपने कहीं चोरी तो नहीं की? सच बताइए?
माधव: (कुसुम के कंधे पर हाथ रखते हुए) नहीं पगली। तेरे पति का सिर कट सकता है, पर झुक नहीं सकता। यह राजा साहब ने दिए हैं।
नरेशन: माधव ने कुसुम को जंगल की सारी घटना बताई—संदूक का मिलना, जगन का हमला और राजा का आना। कुसुम की आँखों से आंसू बह निकले, दुख के नहीं, बल्कि गर्व के।
कुसुम: मुझे पता था। मुझे पता था कि आपकी अच्छाई ही एक दिन हमें बचाएगी। लेकिन... मुझे बड़े भैया से डर लग रहा है। वो बहुत पहुँच वाले हैं। कल दरबार में वो आपको झूठा साबित करने के लिए कुछ भी करेंगे।
माधव: करने दे उन्हें। सांच को आंच क्या? अब तू जल्दी से आग जला और इन सिक्कों से पास वाले वैद्य जी से दवाई और हलवाई से गोलू के लिए गर्म दूध ले आ। आज हमारा बेटा भूखा नहीं सोएगा।
नरेशन: उस रात माधव की झोपड़ी में आग जली। घर गर्म हुआ। गोलू ने पेट भरकर खाना खाया। लेकिन माधव की आँखों में नींद नहीं थी। उसे चिंता थी कल की। वो जानता था कि जगन चुप नहीं बैठेगा। और उसकी चिंता जायज़ थी, क्योंकि उधर हवेली में एक खतरनाक साजिश रची जा रही थी।
Scene 8 जगन की हवेली (षड्यंत्र)
नरेशन: जगन अपनी हवेली के बड़े कमरे में गुस्से से इधर-उधर टहल रहा था। कालू कोने में खड़ा कांप रहा था। जगन ने मेज पर रखा कांच का गिलास ज़मीन पर दे मारा।
जगन: (चिल्लाते हुए) बेवकूफ! नालायक! एक काम ठीक से नहीं होता तुझसे। अगर तूने उसे कस के पकड़ा होता, तो मैं संदूक लेकर भाग गया होता। अब मामला राजा के पास पहुँच गया है।
कालू: मालिक, गलती हो गई। लेकिन अब क्या करेंगे? राजा तो बहुत सख्त हैं। अगर पता चला कि हम झूठ बोल रहे हैं तो कोड़ों से मरवा देंगे।
जगन: (कुटिल मुस्कान के साथ) पता तब चलेगा न जब कोई सच बोलेगा? राजा न्याय करते हैं, सबूतों पर। और सबूत खरीदे जा सकते हैं।
कालू: मतलब?
जगन: मतलब यह कि कल दरबार में साबित होगा कि वो संदूक मेरा है। (कालू के पास जाकर) सुन, अभी जा और गाँव के उस बूढ़े मुनीम को बुलाकर ला। उसे कह कि अगर वो गवाही देगा कि उसने मेरे दादाजी के पास वो संदूक देखा था, तो मैं उसका सारा कर्जा माफ कर दूंगा। और हाँ, दो-चार गवाह और तैयार कर जो कहें कि माधव एक नंबर का जुआरी और चोर है।
कालू: वाह मालिक! क्या दिमाग है। माधव की ईमानदारी की तो धज्जियां उड़ जाएंगी।
जगन: माधव को लगता है कि सच्चाई उसे बचा लेगी। कल मैं उसे भरे दरबार में इतना जलील करूँगा कि वो गाँव छोड़कर भाग जाएगा। और वो शाही खजाना... वो तो मेरा होकर ही रहेगा।
नरेशन: रात के अंधेरे में झूठ और फरेब का जाल बुना जा रहा था। जगन पैसे के दम पर गवाह खरीद रहा था, और उधर माधव भगवान के भरोसे बैठा था। सुबह होने वाली थी, जो माधव की जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान लाने वाली थी।
Scene 9 राजदरबार (न्याय की लड़ाई)
नरेशन: अगला दिन। राजा रणजीत सिंह का दरबार खचाखच भरा हुआ था। गाँव के लोग, मंत्री और दरबारी अपनी-अपनी जगह मौजूद थे। दरबार के बीचों-बीच एक ऊंचे स्थान पर वह रहस्यमयी संदूक रखा था। एक तरफ माधव खड़ा था, सिर झुकाए हुए। दूसरी तरफ जगन खड़ा था, नए कपड़े पहने, तना हुआ और आत्मविश्वास से भरा हुआ।
राजा रणजीत सिंह: (सिंहासन से) कार्यवाही शुरू की जाए। जगन, तुम दावा करते हो कि यह संदूक तुम्हारा है?
जगन: (हाथ जोड़कर, नाटक करते हुए) जी अन्नदाता। यह संदूक मेरे परदादा सेठ धनीराम का है। बरसों पहले यह चोरी हो गया था। कल जब मैंने इसे माधव के पास देखा, तो पहचान गया। मैंने इसे वापस मांगा, तो इसने मुझे मारने की कोशिश की।
राजा: तुम्हारे पास क्या सबूत है?
जगन: सबूत हैं महाराज। ये देखिए, हमारे पुराने मुनीम जी। और गाँव के दो प्रतिष्ठित लोग। ये गवाही देंगे।
नरेशन: जगन के खरीदे हुए गवाहों ने एक-एक करके झूठ बोला। मुनीम ने कहा कि उसने बचपन में यह संदूक जगन के घर देखा था। दूसरे गवाह ने कहा कि माधव अक्सर जुआ खेलता है और उस पर बहुत उधारी है। यह सुनकर पूरे दरबार में कानाफूसी शुरू हो गई। लोग माधव को शक की नज़र से देखने लगे। माधव की आँखों में आंसू आ गए।
राजा: (माधव की ओर देखते हुए बलता है कि) माधव, तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?
माधव: (रुंधे गले से कहेता है) महाराज, मैं गरीब जरूर हूँ, लेकिन चोर नहीं। मैं जुआ नहीं खेलता। ये सब झूठ बोल रहे हैं। मेरे पास कोई गवाह नहीं है। मेरा गवाह सिर्फ मेरा ईमान है और... और वो बूढ़ा बाबा जो मुझे जंगल में मिला था।
जगन: (हँसते हुए कहेता है) बूढ़ा बाबा? महाराज, यह पागल हो गया है। जंगल में कोई नहीं रहता। यह मनगढ़ंत कहानियां बना रहा है।
नरेशन: तभी दरबार के मुख्य द्वार से एक तेज़ आवाज़ आई।
आवाज़: ठहरिए! गवाह मैं हूँ।
नरेशन: सबकी नज़रें दरवाजे की ओर घूमीं। वहां वही बूढ़ा व्यक्ति खड़ा था जो माधव को जंगल में मिला था। लेकिन आज उसने फटे कपड़े नहीं पहने थे। आज वो भगवा वस्त्र में था और उसके चेहरे पर गजब का तेज था। उसे देखते ही राजा रणजीत सिंह अपने सिंहासन से खड़े हो गए।
राजा: राजगुरु? आप?
नरेशन: पूरा दरबार सन्न रह गया। जिसे माधव भिखारी समझ रहा था, वो राज्य के राजगुरु देवदत्त थे। राजगुरु धीरे-धीरे चलते हुए दरबार के बीच में आए।
राजगुरु: हाँ राजन। मैं ही उस जंगल में तपस्या कर रहा था। और मैंने अपनी आँखों से देखा है। इस माधव ने भूख से तड़पते हुए भी इस संदूक को खोलने से मना कर दिया। और इस जगन ने... इसने अपने ही भाई की हत्या करने की कोशिश की।
जगन: (पसीना पोंछते हुए) म.. महाराज... यह.. यह बाबा झूठ बोल रहे हैं। यह माधव से मिले हुए हैं।
राजा: (गुस्से से) खामोश जगन! राजगुरु पर आक्षेप लगाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? इनका एक शब्द तुम्हारे सौ गवाहों पर भारी है।
नरेशन: जगन का पूरा खेल बिगड़ता नज़र आ रहा था। लेकिन वो इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था।
जगन: महाराज, क्षमा करें। हो सकता है बाबा ने अंधेरे में कुछ और देखा हो। लेकिन संदूक तो मेरा ही है। अगर यह मेरा नहीं है, तो माधव का भी नहीं है। यह शाही संदूक है, तो इस पर मेरा भी हक़ बनता है खोजने वाले के नाते।
राजा: (सोच में पड़ते हुए) बात तो तर्क की है। संदूक किसका है, यह अभी सिद्ध नहीं हुआ। (राजा ने संदूक की ओर देखा) यह संदूक साधारण नहीं है। इसे खोलने की चाबी किसी के पास नहीं है।
Scene 10 अंतिम परीक्षा
नरेशन: राजा ने एक अनोखी घोषणा की। उन्होंने कहा कि असली वारिस वही होगा जो बिना खोले बता सके कि इसके अंदर क्या है। या फिर इस संदूक को खोल सके।
राजा: जगन, अगर यह तुम्हारे पूर्वजों का है, तो बताओ इसके अंदर क्या है?
जगन: (हड़बड़ाते हुए, तुक्का लगाते हुए) जी... जी इसके अंदर सोने के सिक्के हैं। और... और हीरे के हार हैं। हाँ, बहुत सारे हीरे हैं।
राजा: ठीक है। माधव, तुम बताओ, इसके अंदर क्या है?
माधव: महाराज, मुझे नहीं पता। मैंने इसे कभी खोलकर नहीं देखा। मैं झूठ नहीं बोल सकता।
राजा: (मुस्कुराते हुए बलता है) सच बोलने का साहस बहुत कम लोगों में होता है। लेकिन फैसला अभी बाकी है। राजगुरु, क्या आप इस संदूक का रहस्य जानते हैं?
राजगुरु: राजन, इस संदूक के ऊपर एक प्राचीन पहेली लिखी है। (संदूक के ढक्कन पर उंगली फेरते हुए केहेता है) जो इस पहेली को सुलझा लेगा, संदूक उसी का होगा। और जो गलत जवाब देगा... उसे उम्रकैद मिलेगी।
नरेशन: यह सुनते ही जगन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उम्रकैद? वो पीछे हटने लगा।
राजा: पहेली पढ़ो राजगुरु।
राजगुरु: पहेली है - "मैं वो हूँ जो बांटने से बढ़ता है, लेकिन अगर छिपाओ तो सड़ जाता है। अमीर मुझे खरीद नहीं सकता, और गरीब मुझे बेच नहीं सकता। बताओ मैं क्या हूँ?"
नरेशन: पूरा दरबार शांत हो गया। जगन माथे का पसीना पोंछ रहा था। उसे सिर्फ सोना-चांदी समझ आता था, पहेलियां नहीं।
जगन: (डरते हुए बलता है) यह... यह अनाज है? या पैसा? नहीं नहीं... ज़मीन !!
राजा: गलत! बिलकुल गलत। अब तुम्हारी बारी माधव। अगर तुमने सही जवाब दिया, तो संदूक के अंदर जो भी है, उसका आधा हिस्सा तुम्हारा होगा। और अगर गलत दिया... तो तुम भी जगन के साथ जेल जाओगे। सोच समझकर बोलना।
नरेशन: माधव ने आँखें बंद कीं। उसने अपने पिता की बातों को याद किया। "अमीर खरीद नहीं सकता... गरीब बेच नहीं सकता..."। उसकी आँखों के सामने अपनी पत्नी, अपना बच्चा और अपनी ईमानदारी का संघर्ष आ गया। उसने आँखें खोलीं।
माधव: महाराज... क्या मैं जवाब दूँ?
राजा: बोलो माधव।
माधव: महाराज, इसका उत्तर है - "ज्ञान और ईमानदारी" (या फिर 'विद्या')। क्योंकि ज्ञान और ईमानदारी बांटने से बढ़ती है, छिपाने से व्यर्थ हो जाती है। इसे कोई धन से खरीद नहीं सकता।
नरेशन: माधव का जवाब सुनते ही संदूक के अंदर से एक हल्की "खट" की आवाज़ आई। मानो कोई अदृश्य ताला खुल गया हो। राजगुरु के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
राजगुरु: सत्य वचन! संदूक खुल गया है।
नरेशन: जैसे ही संदूक का ढक्कन उठाया गया, दरबार में बैठी हर आँख फटी रह गई। उसके अंदर सोना नहीं था, चांदी नहीं थी... उसके अंदर कुछ ऐसा था जिसे देखकर जगन के होश उड़ गए और राजा भी हैरान रह गए।
आखिर संदूक में ऐसा क्या था? क्या माधव की मुसीबतें खत्म होंगी या यह किसी नई मुसीबत की शुरुआत है? यह जानने के लिए देखिए कहानी का अगला भाग !!
TO BE CONTINUED…..
✍️ Script by: Govind Gurjar
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